सोमवार, 15 जनवरी 2018

मिशन 2018

मिशन 2018
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विडंबना है कि 2018 के लिए लक्ष्य निर्धारित करते हुए साल के पहले दो हफ्ते बीत भी चुके हैं । तय किया था कि 2018 में कुछ ठोस लक्ष्य तय किए जाएँ और व्यवस्थित रुप से उस पर काम किया जाए , बावजूद इसके कि यह मेरा कमजोर पहलू है । रुटीन पालन करना मेरे लिए मुश्किल है ,यह जानतेहुए भी कि बिना अनुशासन और व्यवस्था के कुछ हासिल करना असंभव है । हालँकि यह गजब विरोधाभास है कि रचनात्मकता का अनुशासन और व्यवस्था से विरोध ही रहा है , लेकिन उनके अभाव में रचनात्मकता कुछ हासिल नहीं कर पाती है ।
बहरहाल तय किया है कि 2018 में
1 - कम से कम छह कहानियों का एक संग्रह पुरा किया जाए । फोकस लिखने पर ही रहेगा । छपवाने की चिंता नहीं करनी है । फेसबुक और अपनी वेबसाइट पर ही डाल दी जाएगी ।
2 - विचारात्मक लेखन में अ) एक सेक्युलर का हलफनामा ब) आत्मकथ्य -स्व से संवाद स) नास्तिकता के पक्ष में पोस्ट के सीरीज रुप में पुरा करना है ।
3 - पूर्वाग्रह पर एक संकलन विश्लेषण के साथ तैयार करना है ।
पढ़ने में साहित्य के अलावा
- बैंकिंग पर नौकरी की जरुरत के हिसाब से पढ़ना है जो अक्सर हाशिए पर रह जाता है ।
-पिछले साल की अधूरी पढ़ी गयी किताबें पुरी करनी है।
- दर्शन और इतिहास पर इस साल विशेष रुप से पढ़ना है ।
- पढ़ी गयी किताबों पर पाठकीय प्रतिक्रिया लगानी है ।
3- इस साल चार राज्य की रोड ट्रिप करनी है
- राजस्थान , गुजरात , पँजाब , मध्य प्रदेश
( विदेश यात्रा को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाला जाए ।)
4 - समाज सेवा में OXFAM को माध्यम में कुछ बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाना है । साथ ही राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की "हर हाथ किताब " योजना के माध्यम से किताबें वितरित करनी हैं ।
दूसरे अपनी योजनाओं पर खुली चर्चा करनी है , इन्हें व्यवहारिक रुप देने की संभावनाओं और चुनौतियों पर विमर्श कर हुए क्रियान्वण आत करनी है , भले ही छोटे स्तर पर !
5 - स्वास्थ्य प्राथिमकता रहेगी और व्यायाम, पौष्टिक भोजन जीवन का इस कदर हिस्सा होना चाहिए कि उसके लिए अलग से लक्ष्य निर्धारित करने की जरुरत न पड़े ।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

लेखा जोखा 2017

लेखा जोखा 2017
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2017 का आखिरी सप्ताह चल रहा है । ऐसे में जरुरी है कि 2017 का लेखा जोखा रख लिया जाए और 2018 के कार्यक्रम की रुपरेखा बना ली जाए ।
2017 की शुरुआत में फेसबुक पर ही सार्वजनिक रुप से 2017 के लिए दिशा निर्देश तय किया था ।
इसमें कुछ मुद्दों पर लड़ाई मोल लेना था . किया भी । ऐसा नहीं कह सकता कि जीत गया, पर हारा भी नहीं । जो मुद्दा था, उसे उठाने में और कुछ हद तक मनवाने में कामयाब रहा । डिटेल में जान
...ा संभव नहीं है ।
लिखने के बारे में लक्ष्य निर्धारित किया था । लेकिन साल के शुरुआती महीनों में ही फेसबुक पर लिखा , जो बाद में फेसबुक से दूरी बनाने के कारण नगण्य हो गया । बाकी किसी पत्र पत्रिका , वेबसाइट , यहाँ तक कि अपनी ही वेबसाइट के लिए भी नहीं लिखा । जो लिखा वह फेसबुक पर ही लिखा जिसे मैं खुद ही महत्वपूर्ण नहीं मानता ।
पढ़ने के बारे में स्थिति कुछ बेहतर रही । ढेर सारी किताबें खरीदी और पढीं भी ।कुछ किताबें पढ़ना उपलब्धि रही । हालाँकि स्थिति और बेहतर हो सकती थी । कई किताबें जो खरीद ली पढ़ न सका, कुछ शुरुआत करने के बाद खत्म न कर सका , व्यवस्थित तरीके से नहीं पढ़ा ।कहना चाहिए कि अध्ययन के बजाए आस्वादन के लिए पढ़ा ।
घूमने में स्थिति बढ़या रही । यूरोप जाने की योजना कई मशक्कत के बाद भी सफल नहीं हुई । फिर भी भूटान , नेपाल , उत्तर प्रदेश ( बनारस, गोरखपुर, लखनऊ , आगरा , इलाहाबाद ), हिमाचल प्रदेश ( शिमला, कसौली ), राजस्थान ( जयपुर, अलवर ) घूमा ।
जो अन्य बातें उल्लेखनीय थीं
- ड्रिंकिंग और स्मोकिंग पुरी तरह काबू में रहा । साल भर में एक -दो मौके को छोड़ कर पुरी तरह बंद रहा ।
- फेसबुक, नेट एडिक्शन बहुत हद तक कम कर दिया । ( यह पोस्ट लिखने की भी इच्छा नहीं हो रही है । )
-जिम/फिटनेस पूरी तरह नियमित न रहा तो पुरी तरह छूटा भी नहीं ।
- खान पान पर बीच में नियंत्रण छूटने के अलावा ज्यादातर समय काबू में रहा । नाश्ता और रात का खाना खुद बनाना जारी है ।
- बड़े शौक से कैमरा खरीदा था। यूँ ही रख छोड़ा है ।
- वेबसाइट बनवाई थी जो अभी भी है , लेकिन फेसबुक से दूरी बनाने पर वह भी छूट गयी।
- डिप्रेशन /एंजाइटी तो खैर लगा ही रहता है, लेकिन एक दो मौकों को छोड़ कर काबू से बाहर नहीं गया ।
-दवाई पर निर्भरता बढ़ गयी है, लेकिन स्वास्थ्य ठीक ही है ।

खैर ! कुल मिला कर यह साल ठीक ठाक ही गुजरा , अच्छा भले ही न कहें ।

रविवार, 10 सितंबर 2017

घरेलू सहायक पर जाति छिपाने के लिए एफआईआर दर्ज करने पर प्रतिक्रिया

पिछले दिनों एक खबर प्रमुखता से छपी । जिसमें एक महिला वैज्ञानिक ने अपने घरेलू सहायक के प्रति शिकायत दर्ज की कि उसने अपनी जाति छिपाई और उसका "धर्म भ्रष्ट " कर दिया ।
इस मामले में कई चीजें स्पष्ट होती हैं जिसे बहुजन विचारक से लेकर साधारण कर्यकर्ता तक बार बार कहते रहे हैं ।
- पुलिस ने एफआईआर दर्ज भी कर लिया जो कि बलात्कार से लेकर चोरी तक जैसे संगीन मामलों में मुश्किल से होता है । लेकिन इस मामले में उस महिला वैज्ञानिक पर मुकद मा दर्ज करने के बजाए पीड़ित के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया । यह स्पष्ट है कि शासन तंत्र पर किस तरह कथित ऊँची जातियों का कब्जा है और कानून को तोड़ मरोड़ कर मनमानी व्याख्या द्वारा अपने हक में इस्तेमाल करती हैं ।
- वैज्ञानिक होना - कम से कम भारत में - अनिवार्यत: वैज्ञानिक सोच का होना नहीं है । यह दुर्भाग्यपुर्ण है कि भारत में विज्ञान और तकनीकि विषय पढ़ने वाले ही आधुनिक शिक्षा और तकनीकि का सर्वाधिक लाभ लेकर भी सामाजिक रुप से भयंकर परंपरावादी और तमाम कुरीतियों का पोषक है ।
- घरेलू सहायक यादव जाति की बतायी जाती है । पारंपरिक रुप से जातिगत सीढ़ी में यादव कम से कम अछूत नहीं है । बिहार और उत्तर प्रदेश में उसे दबंग जाति मानी जाती है और भाजपा जैसी पार्टियाँ पिछड़ों और दलितों को उनके खिलाफ लामबंद करने का प्रयास करती हैं - यह कह कर कि उसन आरक्षण आदि का सारा फायदा ये जातियाँ ले गयीं ।फिर भी ये स्पष्ट है कि घृणित ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद खुद को छोड़ कर सबको अपवित्र मानता है । इसलिए मध्य जातियाँ का हिंदू के नाम पर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद को प्रश्रय देना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है ।
- सारी महिलाएँ एक हैं - यह एक थोथा नारीवादी स्वप्न है , यथार्थ नहीं । महिलाएँ लैंगिग आधार पर एक मंच पर आने के बजाए अपने वर्ग , धर्म और जाति के साथ रहना अधिक पसंद करती हैं । यह तर्क स्वीकार्य है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में यह अधिक सुविधाजनक होता है , लेकिन इस आधार पर उच्च शिक्षित महिला को छूट नहीं दी जा सकती । वह भी उतनी ही आलोच्य है ।
- कहाँ है जाति , कहाँ है जाति पूछने वाले और सिर्फ आरक्षण को जातिगत भेदभाव मानने वाले सवर्ण धूर्तों को यह खबर आँख में उँगली डाल कर पढ़वानी चाहिए ।
-जिन्हें सिर्फ ब्राह्मणों को घरेलू सहायक रखने में जातिगत भेदभाव नहीं दिख रहा है और इसे व्यक्ति स्वातंत्र्य मान रहे हैं , खास उनके लिए एक विज्ञापन मैं देना चाहता हूँ ।
- आवश्यकता है एक कुलीन ब्राह्मण की जिसे सुबह सुबह नित्य क्रिया के समय मेरी गाँड धोनी पड़ेगी । मानदेय 10000/- रुपये महिना । दिन में सिर्फ मुश्किल से दस मिनट खर्च कर इतनी रकम बुरी नहीं है । किसी गरीब ब्राह्मण की मदद करने के लिए यह मेरा प्रयास है । उम्मीद है ब्राह्मण इसे अन्यथा न लेंगे । इच्छुक ब्राह्मण कमेंट में संपर्क करें ।
शुक्रिया !

सोमवार, 21 अगस्त 2017

बैंक- बैंकर : युनियन 1

- अच्छा तो कल हड़ताल है !
- किसलिए हड़ताल है ?
- होना जाना कुछ नहीं , बस कल फिर एक दिन वेतन कट जाना है ।
- कल फिल्म देखने चलते हैं ।बैंक तो जाना नहीं है ।प्रदर्शन में जा कर क्या करेंगे । 
- मैनेजमेंट और सरकार बहुत स्ट्राँग है । कुछ भी नहीं युनियन के बस का ।
-युनियन तो हड़ताल बस इसलिए करती है कि बता सके युनियन अभी भी है ।
- मै तो नहीं जा रहा हड़ताल पर !
ये और ऐसी ही कई प्रतिक्रिया हो जो कल बैंकों में हड़ताल के बारे में आम बैंकरों की राय है ।
इनसे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि आम बैंकर हड़ताल में जाने का इच्छूक ही नहीं है । जाता है तो भी अनिच्छा से । उसे न युनियन पर भरोसा है और न ही उसके कार्यक्रमों पर । उसे युनियन की जरुरत बस ट्रांसफर , चार्जशीट जैसे मौकों पर लगती है । एक तरह से वह युनियन को मैनेजमेंट और उसके बीच ब्रोकर के रुप में देखता है जो संकुचित दृष्टिकोण है ।
किसी भी संगठन की ताकत उसके सदस्यों का सामुहिक रुप से सबके हित के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करने की इच्छा होती है । अफसोस कि बैंकरों में इस सामुहिकता का हाल फिलहाल घोर अभाव है । वे थके हुए भेड़चाल में शामिल होकर युनियन गतिविधि में शामिल होते हैं । अधिकांश तो औपचारिक रुप से भी कार्यक्रमों में शामिल नहीं होते हैं ।
ऐसे में युनियन का कमजोर होना अचरज की बात नहीं है ।
अगले पोस्ट में जारी रहेगा ‍!
#बैंक_बैंकर युनियन - 1

रविवार, 20 अगस्त 2017

रेल दुर्घटना

न दिनों रेल दुर्घटना होने पर आतंकवादी साजिश की खबर उड़ने लगती है । दुर्घटना के लिए रेल प्रशासन , रेल मंत्रालय आदि को जिम्मेदारी से मुक्त करने के लिए इस तरह की अफवाह उड़ाई जाती है । और लोग मान भी लेते हैं ।
जबकि यह सहज बुद्धि - जो आज के राजनीतिक भक्ति काल में बहुत ही दुर्लभ हो गया है - की बात है कि आतंकवादी आम अपराधियों से अलग होते हैं । वे वारदात के बाद भागने या छूपने के बजाए खुल कर जिम्मेदारी लेते हैं , ताकि ज्यादा आतंक फैले । गौर कीजिए कई आतंकवादी संगठन वारदात के बाद वीडियो , मैसेज आदि खुद ही जिम्मेदारी लेते हुए प्रसारित करवाते हैं ।भाजपा सरकार में रेल दुर्घटना के बाद जिस तरह हर बार आतंकी साजिश सुंघी जाती है , पता तो चले वे कौन से आतंकी है । सिर्फ पाकिस्तान कह देने से तो काम नहीं चलता ।
स्पष्ट है कि आतंकी साजिश महज शिगूफा है । कोई साजिश है तो वह है रेल को बर्बाद कर उसके निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करना । जो कि पीपीपी के नाम पर रेलवे स्टेशनों की निलामी , अधिकाँश काम भी ठेके पर करवाने आदि के रुप में जारी है और इसमें तेजी लाई जा रही है ।
इसके पीछे तो वही सरकार है जिन पर इन्हें चलाने की जिम्मेदारी है ।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

धर्मनिरपेक्ष राज्य की आवश्यकता

दो खबरों पर गौर कीजिए !
- पहला गोरखपुर में मेडिकल में प्रशासन और प्रबंधन की असफलता की वजह से कई बच्चे मौत के ग्रास बन गये ।भले ही लीपा पोती और बलि का बकरा ढूँढ लिया गया हो , भले ही भाजपा सरकार में इस्तीफे न होते हों , तंत्र की विफलता नंगी सामने खड़ी है । 
-दूसरे ठीक इसी वक्त प्रशासनिक तंत्र को 'जन्माष्टमि ' भव्य स्तर पर मनाने के लिए निर्देशित किया गया । हालाँकि यह त्योहार लोग अपने मोहल्ले स्तर पर ही सामुदायिक सहयोग से मना लेते हैं । धूमधाम भी रहती है । लेकिन इसमें प्रशासन का  "लॉ एंड ऑर्डर " बनाए रखने के अलावा किसी और हस्तक्षेप की जरुरत नहीं है ।
यहाँ जनसामान्य को यह समझना चाहिए कि धर्म और उत्सव वे अपने संसाधन और सहयोग से मना सकते हैं । लेकिन सबके लिए स्वास्थ्य , शिक्षा, देशव्यापी परिवहन आदि के लिए जिस स्तर के संसाधन की जरुरत पड़ती है , वह सरकार ही कर सकती है । व्यक्तिगत स्तर पर यह संभव नहीं और पूँजीपति वर्ग की प्राथमिकता मुनाफा होगी , सबके लिए स्वास्थ्य , शिक्षा नहीं ।
अभी भारत की बहुसंख्यक जनता खासतौर पर बहुजन हिंदू राष्ट्र के लिए लहालोट हो रही है , और शिक्षा , स्वास्थ्य , सार्वजनिक परिवहन आदि मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं , यह स्थीति जनता के लिए ही घातक है । सरकार के लिए यह आसान है कि वह जन्माष्टमि का लड्डू खिला दे और शिक्षा आदि पर अंडा थमा दे । जनता के लिए आवश्यक और लाभदायक है धर्मनिरपेक्ष राज्य , न कि धार्मिक राज्य -चाहे वह कोई भी धर्म हो ! धर्म के पालन के लिए सरकार पर निर्भरता जरुरी नहीं है ।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

नीतीश के इस्तिफे पर प्रतिक्रिया

जब नीतीश ने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ा था , तब भी मेरी प्रतिक्रिया यही थी जो आज नीतीश के इस्तीफा देने पर है - ये क्या कर दिया !
मेरी चिंता का विषय न नीतीश और जद यू है , न ही लालू और राजद , न ही काँग्रेस या भाजपा !मेरी चिंता यह है कि बिहार में एक स्थिर सरकार रहे और सामाजिक न्याय के साथ विकास हो ।
वर्तमान सरकार में नीतीश कुमार को यह मौका था । भले ही नीतीश कुमार इसे नैतिकता के आधार पर इस्तिफा मनवाना चाहें , यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नतीजा है । हालाँकि राजनीति में न महत्वाकांक्षा गलत है , न अवसरवादिता , लेकिन यह तो पूछना ही पड़ेगा कि प्रयोजन क्या है !
प्रधानमंत्री बनने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तो भाजपा के साथ पूरी नहीं हो सकती । वर्तमान सरकार मेें अपने कद और पकड़ को बढ़ाने के लिए इस्तीफा देना बहुत बड़ा जूआ है । नीतीश लालू के साथ दूबारा जूड़ते हैं या भाजपा से , दोनों हालात में वे अविश्सवनीय रहेंगे और तभी तक उन्हें जरुरी माना जाएगा, जब तक भाजपा या राजद अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए दाँव न खेले ! जद यू और नीतीश इसके लिए दाँव खेलेगी , इसकी संभावना कम है । उनके पास इस बात का लाभ है कि राजद और भाजपा एक साथ नहीं आ सकते ।कम से कम फिलहाल तो बिल्कुल नहीं ।
इसके साथ ही तीसरे मोर्चे की कल्पना या कांग्रेस के नेतृत्व में संयूक्त विपक्ष - जो पहले भी प्लानिंग के स्तर पर ही था और दूर की संभावना लग रही थी और भी असंभव हो गयी है ।
भाजपा समर्थक इसे एक विरोधी और संभावित खतरे के ढह जाने के रुप में देख रहे हैं , जिसके लिए वे बिहार सरकार के गठन से पहले भी लगे हुए थे । आश्चर्य नहीं कि खुद मोदी ने ट्विट कर नीतीश क समर्थन किया है ।
बिहार का भविष्य एक बार फिर अनिश्चय में है ।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

विश्वविद्यालय पर हमला

एक बार फिर जेएनयू चर्चा में है । कारण शिक्षा के अलावा अन्य कारण से है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है । जेएनयू के अलावा जामिया , अलीगढ़ विश्वविद्यालय आदि भी शिक्षेतर कारणों से चर्चा में रहे हैं । इसका कारण सरकार का विश्वविद्यालय में गैरजरुरी हस्तक्षेप है । वर्तमान सरकार इन विश्वविद्यालयों में "अपने लोग " बैठाना चाहती है । इसके पहले की भी सरकारें अपने लोगों को उपकृत करती रही हैं । लेकिन ऐसे लोग चुने जाते थे जिनका अपने क्षेत्र में योगदान असंदिग्ध रहता था । लेकिन इस सरकार के पास ऐसे लोग हैं ही नहीं ।
ये विश्वविद्यालय देश के श्रेष्ठ विश्विद्यालय माने जाते हैं । इनकी भी अपनी कमियाँ हैं और इनमें भी सुधार की पर्याप्त संभावना है । फिर भी ये ऐसे ढेर सारे विश्वविद्यालयों से अच्छे हैं जिनका सत्र दो-तीन साल लेट चलता है । जिनसे संबद्ध कॉलेजों में पढ़ाई नहीं होती , पर्याप्त शिक्षक नहीं है , भवन भी नहीं है , जो कागज पर ही चल रहे हैं , जो बस डिग्री बाटने की दूकानें मात्र हैं ।
अफसोस की बात है ऐसे विश्वविद्यालयों को सुधारने के बजाए अपेक्षाकृत बेहतर विश्वविद्यालयों में राजनीतिक पकड़ बनाने के लिए शिक्षाविरोधी कदम उठा रही है और इन्हें बरबाद करने पर तुली है ।

सोमवार, 24 जुलाई 2017

विश्वविद्यालय में टैंक


यह खबर चौंका देने वाली लग सकती है - लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में बिल्कुल नहीं है - कि जेएनयू के कूलपति विश्वविद्यालय में टैंक लगाना चहते हैं ताकि विद्यार्थियों में "देशभक्ति " की भावना आए । 
पिछले दिनों जेएयू पर कई तरह के हमले हुए हैं । इसे बदनाम करने और प्रतिरोध की संस्कृति को नष्ट करने के कई उपाय किये गये हैं । साथ ही सीट कटौति जैसे छात्र और शिक्षण विरोधी कदम उठाए गये हैं । 
टैंक की स्थापना का विचार भी इसी दमन की अगली कड़ी है । इसका उद्देश्य छात्रों में देशभक्ति की भावना नहीं , बल्कि भय का संचार करना है । टैंक प्रतीक है निर्कुश सत्ता और दमन का , देशभक्ति का नहीं ।
यह भी गौरतलब है कि जेएनयू में परास्नातक और शोध करने वाले छात्र होते हैं । उन्हें प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों की तरह कोई भी बात - भले ही वह देशभक्ति हो - घूट्टी में नहीं पिलाई जा सकती है ।
विश्वविद्यालय को ज्ञान और शोध का केंद्र बने रहना चाहिए । यह अफसोस की बात है कि उच्च शिक्षा के शीर्ष संस्थान के कूलपति की चिंता में शिक्षा नहीं , देशभक्ति है ।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

मायावती का इस्तिफा

संसंसद विचार विमर्श की जगह है । राजतंत्र में जब मुद्दे तलवार के दम पर तय होते थे , तब भी सूलह समझौते की गुंजाइश होती थी । लोकतंत्र में तो संसद है ही इसलिए कि लोग विचार विमर्श के बाद बहुमत के आधार पर निर्णय ले ।
ऐसे में मायावती को सहारनपुर के दलित विरुद्ध हिंसा पर न बोलने न देना , एक अलोकतांत्रिक कदम है । मायावती से असहमति और विरोध जताया जा सकता था, तर्क और तथ्य के सथ, लेकिन हुल्लड़बाजी कर बोलने से रोकना किसी भी तरह उचित नहीं है ।
बेहतर होता , कि मायावती इस्तिफा देने के बजाए हर हाल में अपना वक्तव्य देतीं या वही वक्तव्य प्रेस कान्फ्रेंस में देकर कर साथ में सोशल मीडिया के सहयोग से जन जन में फैलातीं । हालाँकि इस्तिफा देना भी गलत नहीं है ।
मायावती के विरोधी उन्हें दौलत की बेटी और जमीन से दूर नेत्री कहकर आलोचना करते रहे हैं । लेकिन इस मौके पर मायावती ने दिखाया कि उनके लिए दलित और उनके मुद्दे महत्वपूर्ण हैं ।
लालू यादव द्वारा उन्हें राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव दलित पिछड़ों को सामाजिक और राजनीतिक एकता के लिए सकारात्मक कदम है ।हालाँकि इतना काफी नहीं और काफी कुछ किये जाने की जरुरत है ।
लोकतंत्र में संसद का रास्ता सड़क से होकर जाता है । संसद न सही , सड़क पर मायावती और अन्य बहुजन नेताओं को बोलना चाहिए ।
यह सवाल भी भाजपा के बहुजन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्होंने संसद में सहारनपुर और दलित उत्पीड़न के अन्य मुद्दे संसद में क्यों नहीं उठाये ? मायावती जब उन मुद्अदों को उठा रही थी तो पार्पटी लाइन के खिलाफ जाकर उनका समर्नेथन क्यों नहीं किया ? अपने क्षेत्र में बहुजनों के सशक्तिकरण के लिए कौन कौन से उपाय किये ?

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

नीतीश कुमार की महात्वाकांक्षा

नीतीश कुमार की महात्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है । पिछले वर्षों में उन्होंने जितनी भी चालें चलीं ,सब इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर चलीं । बिहार में 8 साल चल चुके भाजपा के साथ गठबंधन को तोड़ने के पीछे भी यही मंशा थी । वे मानकर चल रहे थे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में काँग्रेस की वापसी नहीं होने वाली और भाजपा बहुमत से दूर रहेगी ।ऐसे में वे एनडीए के सर्वस्वीकार्य नेता के रुप में प्रधानमंत्री बन सकते थे ।मोदी का विरोध भी इसी गणित का हिस्सा था । ऐसा न होने पर भी जोड़तोड़ से वे तीसरे मोर्चे के मुखिया के बतौर प्रधानमंत्री बन सकते थे । लेकिन भाजपा के प्रचंड जीत से उनका गणित गड़बड़ा गया ।
फिर उन्होंने बिहार में सत्ता बचाने के लिए लालू से गठजोड़ किया और कम सीट जीतने के बाद भी मुख्यमंत्री बने । लेकिन लगता है कि वे फिर एक बार प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा के लिए बिहार सरकार दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं । हालाँकि महात्वाकांक्षा गलत नहीं है । लेकिन एक राज्य में सीमित पार्टी और गिनती के सांसद के भरोसे यह महात्वाकांक्षा सफलीभूत नहीं होगी ।नीतीश कुमार के लिए लिए तीसरा मोर्चा ही सबसे सही दाँव है ।
हालाँकि नीतीश कुमार चाहें तो बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर भी इतिहास में दर्ज हो सकते हैं । हालाँकि उनकी बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है , अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है ।एक अनिश्चित भविष्य की कल्पना में एक स्थिर सरकार को गिराना गलती होगी । और पहली बार गलती करके बच तो गये, शायद दूसरी बार न बचे !

रविवार, 9 जुलाई 2017

कार्यालय में ड्रेस कोड

पिछले दिनों कुछ सरकारी बैंकों ने गणवेश (ड्रेस कोड ) के लिए दिशा निर्देश जारी किये । कोई ड्रेस तो निर्धारित नहीं किया , लेकिन तकनीकि भाषा में जो निर्देश दिये , उन्हें कर्मचारी लोग सहज रुप से पालन करते ही हैं । ये निर्देश गैरजरुरी लगे ।
यहाँ मुझे एक घटना याद आ रही है जहाँ एक बैंक ने चार्जशीट में एक चार्ज यह भी लगाया था कि कर्मचारी - जो रिटायरमेंट के करीब पहुँचे यूनियन लीडर थे , कि वे कुर्ता पाजामा पहन कर ऑफिस आते हैं । मने हद है !
यह सच है कि एक ड्रेस रहने से एक तरह की साम्यता और अनुशासन झलकता है । लेकिन यह भी ध्यान देना चाहिए कि दर्शनीय होने के चक्कर में ड्रेस की सहजता न खो जाए । काम करने में परेशानी न होने लगे ।
किसी मॉल में काम करने वाली सेल्स गर्ल को देखिए । हाई हील उनके परिधान का हिस्सा है । पर जरा गौर कीजिए कि हाई हील में थोड़ी लंबी ,प्रभावशाली और शाइस्ता भले ही लगती हैं , लेकिन यह उनके काम को दूभर बनाता है जिसमें उन्हें लगभग दिन भर खड़े रहना पड़ता है । डोर टूडोर सेल करने वालों को चमड़े के जूते पहनने के लिए कहा जाता है , जिसमें ज्यादा चलना जो उनके पेशे में आवश्यक है , सही नहीं है । स्पोर्टस शू ज्यादा उपयूक्त है , भले ही थोड़ी कैजूअल फीलिंग आती हो ।
इस तरह गर्म मौसम में कोट और टाई लगाए साहबों को देखिए । एसी ऑफिस से एसी घर में आने वाले और बीच में एसी कार में सफऱ करने वालों को यह भले ही तकलीफदेह न लगे , लेकिन बिना एसी वाली जगह में दिन भर सूट पहनने की कल्पना कीजिए , जब पारा 45 + डिग्री हो ।
मेरे निजी मत में ड्रेस के मामले में दर्शनीयता से अधिक सहजता को महत्व दिया जाना चाहिए । कार्यालय में जिंस , स्पोर्टस शू आदि की स्वीकार्यता होनी चाहिए ।
फैशन के झक में लोग एक से एक असहज पोशाक पहनते ही हैं । कार्यस्थल पर इसे थोपना उचित नहीं ।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

जातिगत पेशों का आधुनिकीकरण -

जातिगत पेशों का आधुनिकीकरण
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एक लॉंड्री स्टार्टअप है - वाशअप । दूसरी है - डूरमिंट !इनका काम है संगठित रुप में कपड़े धूलाई का । मने परंपरा से जिसे एक जाति विशेष - धोबी - पेशे के रुप में करती है । हालाँकि अब भी ये लोग कपड़े धोने , प्रेस करने का काम करते हैं । जो लोग थोड़ी पूँजी लगा सकते हैं वे कपड़ा व्यवसायी लोगों के कपड़े का थान आदि धूलाई और प्रेस मशीन से प्रेस करके देते हैं ।
लेकिन ये स्टार्टअप कॉरपोरेट होटलों , अस्पतालों आदि को धूलाई की सेवा देते हैं । हालाँकि इनमें किन लोगों की नौकरी दी जाती है , इसकी जातिवर गणना उपलब्ध नहीं है । यदि जाति विशेष को लोगों को नहीं लिया जा रहा है तो , यह तय है कि इस व्यवसाय के संगठनीकरण से ज्यादा फायदा कंपनी और निवेशकों को होगा । छोटे स्तर पर करने वालों की तरह वे मालिक और कर्मी दोनों नहीं होंगे ।
यानी व्यवसाय के आधूनिकीरण का फायदा सवर्ण और धनी वर्ग उठाएँगे और जाति विशेष के लोगों के लिए दूसरे व्यवसाय के लिए रास्ता नहीं होगा और यह भी बंद हो जाएगा ।
मेरा मानना है कि एक ऐसा प्लेटफार्म/बिजनेस मॉडल विकसित किया जाए कि जिन जातिगत पेशों के- सिर्फ लाँड्री ही नहीं - आधुनिकीकरण करने की संभावना हो और आज के समय में भी आवश्यक हों , उसके लिए जाति विशेष को सहयोग किया जा सके । हाँ , धन और शिक्षा के बाद उन्हें दूसरे क्षेत्रों में जाने की सुविधा होनी चाहिए ।और उनके श्रम का सम्मान होना चाहिए ।
यह एक चुनौतीपुर्ण कार्य है , लेकिन परंपरागत पेशों से जुड़े बहुजनों के लिए सम्मानजनक आजीविका हेतू आवश्यक है ।

#मेरे_बहुजन_मित्रों सवर्ण धूर्तता और दोगलापन नोट कीजिए ।

अक्सर सवर्ण किसी बहुजन के प्रति चैलेंज उछालते पाये जाते हैं कि दम है तो बिना रिजर्वेशन के नौकरी लेकर दिखाओ । हमारा - यानि सवर्णों का - हक मार रहे हो ।लेकिन यही बहुजन लोग जब जेनरल /अनारक्षित वर्ग से चुने जाते हैं तो उन्हें फिर शिकायत होती है कि बहुजन लोग अनारक्षित वर्ग में चुने जाकर किसी सवर्ण का सीट मार रहे हैं ।
यानि इनके हिसाब से चित भी मेरी , पट भी मेरी । आरक्षित वर्ग से चुने जाएँ तब भी इनका "हक" जाता है और अनारक्षित वर्ग से चुने जाते हैं तब भी इनका "हक " जाता है । दरअसल वे सभी नौकरियों और संसाधनों पर अपना पैदायशी "हक" समझते हैं ।
आरक्षित सीट कई बार खाली रखी जाती है कि "काबिल "लोग नहीं मिले, वहीं दूसरी ओर तरह तरह के नियमों का जाल बना कर किसी बहुजन को अनारक्षित वर्ग से चुने जाने में भी अडँगे लगाएँगे । कि आरक्षित वर्ग के लोग आरक्षित वर्ग में ही चुने जाएँगे ।
#मेरे_बहुजन_मित्रों सवर्ण धूर्तता और दोगलापन नोट कीजिए ।

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

शिक्षा और छात्रों के प्रति आपराधिक असंवेदनशीलता क्यों ?

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र भूख हड़ताल पर हैं । वजह - कोर्स की मान्यता है जिसके लिए विश्वविद्यालय ने न केवल नामांकन लिया , बल्कि कोर्स भी करवाया ।
सवाल है कि क्या कोर्स की मान्यता सुनिश्चित करना छात्र का काम है ? वह भी एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में नामांकन लेते हुए ? क्यों नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन को धोखाधड़ी का जिम्मेदार मानकर कार्यवाई की जाती है ? और क्यों यूजीसी छात्रों को भूख हड़ताल के बावजूद राहत के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है ?
जो काम सामान्य रुप से विश्वविद्यालय और नियामक संस्था - यूजीसी और अन्य - करना चाहिए ,उनके स्तर पर कमी या लापरवाही का दुष्परिणाम छात्र क्यों भूगते !?
सिर्फ इस विश्वविद्यालय में ही नहीं , अन्य जगहों पर भी कई तरह से छात्र संघर्षरत हैं । पंजाब में फीस वृद्धि का विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का चार्जऔर बर्बर पिटाई हुई ।कई जगह 24 घंटे पुस्तकालय खुलने के लिए छात्रों का प्रदर्शन हुआ । हॉस्टल की सुविधा के लिए भूख हड़ताल हो रही है । यह ऐसे मुद्दे हैं जिसे प्रशासन और सरकार को स्वत: संज्ञान लेते हुए काम करना चाहिए । लेकिन यहाँ आंदोलन /प्रदर्शन करने के बाद भी सुनवाई नहीं हो रही है ।
क्या अपनी भावी पीढ़ी और शिक्षा के लिए प्रशासन एकदम संवेदना शून्य हो गया है ? और चिंता की बात यह है कि एक समाज और देश के रुप में यह हमारी चिंता का विषय भी नहीं है !
यह हमारे युवा पीढ़ी के प्रति अपराध है !

मेरे बहुजन मित्रों - सीरिज सिर्फ बहुजनों के लिए हैै ।

स्पष्ट कर दूँ
- जिस पोस्ट पर मैं #मेरे बहुजन मित्रों लिखता हूँ , वह एक सीरिज है जो मैं बहुजनों के लिए उन्हें ध्यान में रखते हुए लिखता हूँ ।
उस पोस्ट पर मैं किसी सवर्ण से संवाद करने का इच्छूक नहीं हूँ ।ऐसा इसलिए कि उनकी आलोचना और आपत्तियाँ अपेक्षित ही हैं । सवाल
वही घिसे पिटे
- आरक्षण क्यों लेते हो ?
- फेसबुक पर लिखकर क्या होगा ?
- ये करो, वो करो !
- जमाना बदल गया है ।
-जातिवाद क्यों फैलाते हो ?
- मैं तो जाति नहीं मानता ?
आदि आदि !
इन सवालों को वे इस ठसक से पूछतें हैं गोया मैं उनके घर का नौकर हूँ । और जवाब देना मेरी मजबुरी ! वैसे नौकर के भी कुछ अधिकार होते हैं ।
इन सवालों के जवाब दिये जा सकते हैं , देता भी हूँ लेकिन मेरा अनुभव है कि वे सब समझ कर न समझने की नौटंकी करते हैं जिसे मैं उनकी धूर्तता मानता हूँ ।
दूसरे उन्हें समझाने से ज्यादा जरुरी मैं बहुजनों को समझाना , जागरुक करना समझता हूँ । और यह मेरा छोटा सा प्रयास है ।
किसी सवर्ण से दोस्ती , संबंध से एतराज नहीं लेकिन जाति के मसले पर कोई समझौता नहीं । वे इस सच के साथ संबंध - चाहे फेसबुक पर या असल दूनिया में - रखें तो ठीक, वरना नमस्कार !!अलविदा!

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तेज बहादूर यादव के निलंबन पर प्रतिक्रिया

बीएसएफ के जवान तेजबहादूर यादव बर्खास्त कर दिये गये । उनका अपराध यह था कि उन्होनें खराब खाने की शिकायत सोशल मीडिया पर वायरल कर दी । उन्हें अनुशासनहीनता को दोषी पाया गया । बीएसएफ की प्रतिक्रिया भले ही दुखद है लेकिन यही अपेक्षित था । कोई भी संस्थान और उसमें जड़ जमाए बैठाए घाघ लोग इसी तरह नियमों की आड़ में गलत कामों का विरोध करने वालों को ठिकाने लगाते हैं ।
लेकिन सवाल है कि क्या संस्थान ने इस बात की जाँच करवाई कि घटिया खाना दिये जाने के लिए कौन दोषी है । भोजन के लिए जारी मद किन कामों में खर्च किये जा रहे हैं । क्या तयशुदा रकम में अच्छा भोजन नहीं दिया जा सकता है । यदि नहीं तो बजट बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए गए ।
जवाबदेही तो संस्थान ( यहाँ बीएसएफ ) की बनती है कि क्यों नहीं सैनिक की पूर्व शिकायतों को गंभीरता से लिया और अपेक्षित सुधार किया । अगर ऐसा होता तो तेजबहादुर को सोशल मीडिया में जाने का डेस्परेट कदम नहीं उठाना पड़ता ।
वैसे यह भी गौर तलब है कि इस समय केंद्र में कथित राष्ट्रवादी सरकार है जो सेना का अतिशय महिमामंडन करती है और सेना का इस्तेमाल नागरिक मुद्दों को दबाने के लिए इमोशनल ब्लैकमेल के लिए करती है - सीमा पर जवान मर रहे हैं और तुम लाइन में नहीं लग सकते ,देशद्रोही । इनके लिए सेना , देश , गाय आदि भावात्मक शोषण करने और जनहितके मुद्दे दबाने के लिए हैं । वरना सेना क्या मजदूर को भी सही भोजन की व्यवस्था नियोजकों को करनी चाहिए । दूसरे किसी गड़बड़ी को उजागर करने वालों को लिए व्हिसल ब्लोअर सुरक्षा योजना होनी चाहिए । यहाँ उल्टे दंडित किया जा रहा है ।
चूँकि जवान यादव है , इसलिए जाति की भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है । पता लगाना चाहिए कि मामले की जाँच करने वाले , निर्णय देने वाले के सरनेम क्या हैं । मुझे हैरत न होगी यदि सारे के सारे जनेऊधारी निकले !
जरुरी है कि तेज प्रताप के साथ मजबुती से खड़े रहने की ,बीएसएफ और सरकार पर दवाब डाल कर तेज प्रताप का उत्पीड़न रुकवाने की एवं बीएसएफ में बोजन संबंधी या अन्य अनियमितताएँ दूर करवाने की ।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

सोनू निगम के ट्वीट पर प्रतिक्रिया


आज के दौर में संवाद करना किस हद तक मुश्किल हो गया है , हम किस कदर बँट गये हैं और किस तरह एक सही मुद्दा गलत ढंग से चर्चा का विषय बनता है और विवाद में असल मुद्दा गायब हो जाता है , इसका एक सटीक उदाहरण है - सोनू निगम द्वारा लाउड स्पीकरों के संबंध में ट्वीट और उसके बाद होने वाली परिचर्चा !
कुछ लोगों ने सोनू निगम पर व्यक्तिगत हमले चालू कर दिये कि वे आजकल बेरोजगार चल रहे हैं और चर्चा में आने के लिए बयान दे करहे हैं या जगराते में गाने वाले भजन जिनका इस्तेमाल भक्ति के लिेए कम और दिखावे के लिए ज्यादा होता है , उन्होंने भी गाये हैं । पहली बात कि बात के साथ कहने वाला भी महत्वपुर्ण है । उसका व्यक्तित्व भी मतलब निकालने में सहायक होता है । लेकिन उनकी व्यक्ति पर इतना फोकस भी ठीक नहीं कि बात ही गुम हो जाए ।उनके बोलने के तमाम वजहें हो सकती है , लेकिन इससे उनकी बात पुरी तरह गलत साबित नहीं होती है ।
इस समय की विडंबना देखिए कि इन दिनों कोई साधारण सा वक्तव्य भी बिना बैलेंस बनाए नहीं दे सकता है । अजान पर बोला है तो जगराता भी बोलना पड़ेगा । ऐसा नहीं है कि जगराते पर नहीं बोला जा सकता या अजान पर नहीं बोला जाए , लेकिन बैलेंस की जरुरत दुखदायी हद तक बढ़ गयी है कि लोग अब बात भी नहीं कर रहे हैं । अब दोनों अलग अलग है । अजान पाँच मिनट के लिए होता है और रोजाना होता है , इसलिए आदमी को आदत हो जाती है । जैसे रेलवे स्टेशन के पास जिनके घर होते हैं उन्हें रेल गुजरने की आवाज की आदत हो जाती है । बाकी पाँच मिनट में ज्यादा नुकसान नहीं होता है । आरती से भी कोई प्राॉब्लम नहीं है । नास्तिक होने के बावजूद अनूप जलोटा , जगजीत सिंह , प्रदीप के भजन सुने हैं और अच्छे भी लगते हैं ।भक्ति काव्य पढ़ा है और अच्छा भी लगता है भले ही भक्ति भाव से नहीं पढ़ता । लेकिन ये फिल्मी गानों के धून पर फूहड़ बोल वाले भक्ति संगीत में भक्ति कहाँ है ये तो भक्त ही बताएँगे । दस पंद्रह मिनट को लिए बर्दाश्त भी कर लें । ये रात भर चलने वाला जगराता बर्दाश्त के बाहर है । नौ दिन वाला जागरण तो जानलेवा है ।
इस वक्तव्य को आसानी से हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त बताया जा सकता है । लेकिन फैक्ट तो फैक्ट है ।
अगर मामला धर्म विरोधी लग रहा है तो स्पष्ट कर दूँ कि मुद्दा जागरण या अजान नहीं लाउडस्पीकर है । अजान , जगराते के साथ हनी सिंह के गाने भी भारी भरकम स्पीकर पर सुनने वाले को भी शामिल कर लीजिए । राजनीति पार्टियों के कार्यक्रम को भी शामिल कर लीजिए । और ध्यान दीजिए कि लाउडस्पीकर लगाने वाले अपने लोगों को ही परेशान करते हैं । जगराता हिंदू बहूल इलाकों में होता है और परेशान भी हिंदू ही होते हैं । मस्जिद भी मुस्लिम बहुल इलाकों में होते हैं । पार्टियाँ भी कार्यकर्म अपने इलाके में ही करते हैं ।
यह भी गौर करने वाली बात है कि अपनी मनस्थीति /परिस्थीति पर भी प्रतिक्रिया निर्भर करता है । घर में शादी - मान लीजिए का माहौल है - तो पड़ोसी देर रात तक बजने वाले गाने पसंद भी करते हैं और न भी आए तो बर्दाश्त करते हैं ।यही रोज बजाने लगें तो टोकने पहूँच जाएँगे ।
वैसे कानून तो है पहले से ही है । जब तक लोग खुद ही अपेक्षित संवेदनशीलता और जिम्मेदारी महसूस नहीं करते , समस्या हल नहीं होने वाली । वैसे इन दिनों कुछ भी बोलने वालों - चाहे वे किसी भी खेमे के हैं -की इस तरह छीछालेदारी हो रही है या ट्रॉल हो रहे हैं कि कोई अमन पसंद आदमी या औरत किसी भी मुद्दे पर नहीं बोलेगा ।
वह एक और बड़ी समस्या होगी ।

स्नैपचैट के सीईओ के भारत को गरीब देश कहने पर प्रतिक्रिया

खबर है कि स्नैपचैट के संस्थापक ने भारत को गरीब कह कर इसे बिजनेस के लिहाज से अपनी प्राथमिकता नहीं माना । इसके विरोध में भारत में तीव्र प्रतिक्रिया दी है ।
हालाँकि आँकड़ों के हिसाब से संपन्नता और विकास के मानदंडों पर भारत गरीब और पिछड़ा ही ठहरता है । विकसित देशों की बात तो जाने हीं दें - कई पैमानों पर भारत श्रीलंका और बांग्लादेश से भी पीछे ठहरते हैं ।इसलिए भारत एक गरीब देश है - यह एक तथ्य है जिसे तभी बदला जा सकता है जब विकास के मानदंडों पर हम बेहतर प्रदर्शन करें । न कि कहने वाले की बोलती बंद करके !
हालाँकि गरीब को गरीब कहना अपमानजनक लगता है ।लेकिन यह भी देखना होगा कि किस संदर्भ में बात कही गयी है । किस अँदाज में कही गयी है । बोलते समय हाव भाव क्या थे , तब समझ में आएगा कि वे महज एक फैक्ट बता रहे हैं या मजाक बना रहे हैं । फिर भी खबरों को पढ़ने पर पता लगता है कि वे बिजनेस की रणनीति में भारत को अपनी प्राथमिकता में नहीं रखते । तो अपमानित करने वाली बात सही नहीं लगती है ।
हालाँकि जिस तरह स्नैपचैट को डाउनग्रेड करने , यहाँ तक की उनकी मंगेतर तक को निशाना बनाने की बात है , यह एक असंयत प्रतिक्रिया है ।यह भवावेश की प्रतिक्रिया है , फेस सेविंग हरकत है ।
वैसे किसी भी एप्प के लिए भारत अपनी जनसंख्या के कारण ही बहुत बड़ा बाजार है । यदि उन्हें भारत सही देश नहीं लगता है तो फेसबुक आदि से सबक लेना चाहिए ।
फिर भी यदि उनकी रणनीति भारत पर फोकस न करने की है तो यही सही । वे अपने लिए एक बड़ा बाजार खुद ही बंद कर रहे हैं ।
स्नैपचैट के सीईओ के भारत को गरीब देश कहने पर प्रतिक्रिया

मेरे बहुजन मित्रों - सवर्णों की घृणा आरक्षण के कारण नहीं जाति के कारण है ।

कोई बहुजन जब किसी मुद्दे पर राय रखता है या कोई अन्य परिपेक्ष्य में विरोध होता है तो व्यक्तिगत हमला के लिए सवर्ण जो जूमला इस्तेमाल करते हैं , वह है - आरक्षण के दम पर सवर्ण का हक मार के नौकरी ले लिया है और बकवास कर रहा है ।
गौर कीजिए कि बंदा चूँकि सवर्ण है , इसलिए नौकरी , संसाधनों और अवसरों पर अपना मालिकाना हक समझता है । आरक्षण इन्हें न समझ आया है और न आएगा ।
दूसर जिन लोगों ने आरक्षण का लाभ न लिया है उनसे इनका व्यवहार कैसा है - नोट कीजिए । वे साधारण सौजन्य दिखाना जरुरी नहीं समझेंगे बहुजन बंदा यदि आर्थिक रुप से कमजोर हुआ या पलटवार करने की स्थीति में नहीं है तब इन सवर्णों की जातिगत घृणा चरम पर होती है ।
यह घृणा किसी आरक्षण की देन नहीं है । जाति की देन है । आरक्षण नहीं रहता तो भी और आरक्षण खत्म हो जाएगा तब भी वे यही घृणा परोसेंगे ।
कोई दलित अपनी शादी में घोड़ी पर चढ़ता है तो उसे रोकने के लिए हिंसा पर उतारु हो जाते हैं , उसकी वजह कोई आरक्षण नहीं है ।
कोई पासवान होटल खोल लिया तो - मने आरक्षण का फायदा नहीं लिया तब भी उन्हें - अब "ये लोग " भी होटल चलाने लगे का कमेंट पास करते हुए देख सुन सकते हैं ।
मेरे बहुजन मित्रों ! ध्यान दें कि आरक्षण को लेकर डिफेंसिव न हों । वे आरक्षण के कारण नहीं जाति के कारण घृणा करते हैं । कोई सफाई न दें ! सीधा बाहर का रास्ता दिखाएँ !
#मेरे_बहुजन_मित्रों