बुधवार, 14 दिसंबर 2016

बैंकर और सेना



चँकि इन दिनों हर बात पर सेना का उदाहरण दिया जाता है , इसलिए मैं सेना का ही उदाहरण देता हूँ ।
अगर सिर्फ मीडिया में आई खबरों को याद करुँ तो
- सेना के जवान यौन शोषण -यहाँ तक कि बलात्कर के आरोपी रहे हैं और उन्हें सजा मिली है । कश्मीर से मणिपुर तक ।
- सेना के जवान घूस लेकर बाँग्लादेशयों को बार्डर पास करवाने में भी शरीक पाए गए हैं ।
- सेना के जवान कैंटीन का सामान ब्लैक करते भी पाए जाते हैं ।
- सेना के कई उच्चाधिकारियों पर खुफिया राज बेचने , सैन्य सामग्रियों की खरीद में दलाली खाने के आरोप लगे हैं और दोषी भी पाए गए हैं ।
आदि आदि
आप यदि खबरों पर निगाह रखते हैं तो ये खबरें आपकी निगाह से भी गुजरी होंगी । नहीं तो गुगल करें , काफी लिंक मिलेंगे ।
लेकिन इन सबके बावजूद यदि सेना को आदर्श मानते हैं - इस कदर कि सेना को हर नागरिक मुद्दों में भी घसीट ले रहे हैं- तो कुछ बैंक कर्मियों के भ्रष्ट कारनामों पर पुरी बैंकिंग को कटघरे में खड़ा न करें । और यदि आपको भरोसा होता कि बैंक वाले भ्रष्ट होता तो अभी तक बैंक से सारा पैसा निकाल चुके होते ।
बैंकर उतने ही भ्रष्ट या ईमानदार हैं जितना कोई आम भारतीय । सिर्फ बैंकर होने से कोई भ्रष्ट नहीं हो जाता ।
#बैंक_बैंकर
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

शाहरुख खान





तो शाहरुख खान अपने "रईस " फिल्म के रीलिज से पहले राज ठाकरे से मिले ताकि वे उनकी फिल्म का विरोध न करे । विरोध का आधार यह कि फिल्म में पाकिस्तानी कलाकार माहिरा खान है । इसके लिए भविष्य में पाकिस्तानी कलाकार को फिल्म में न लेने और प्रमोशन से माहिरा को अलग रखने का वादा भी किया है ।
इस खबर पर कई लोग शाहरुख का मजाक उड़ा रहे हैं , कुछ मायूसी जाहिर कर रहे हैं । कुछ व्यवहारिक भी बता रहे हैं ।
अच्छा लगता मुझे यदि शाहरुख झूकने से मना कर देते । राज ठाकरे से न मिलते । या रीलिज के लिए कोर्ट या राज्य सरकार की शरण में जाते । लेकिन यदि उनहोंनें ऐसा नहीं किया तो वे मुझे उन पर गुस्सा नहीं आ रहा , मुझे गुस्सा इस सिस्टम पे आ रहा है जिसमें केंद्र सरकार - जिनके पास इस बारे में निर्णय लेने का अधिकार है कि् कौन भारत आ सकता है और किस काम के लिए - इस बारे में निर्णय नहीं लेती , बल्कि नॉन - स्टेट एलिमेंट - जिनका इकलौता होल्ड यह है कि वे मुंबई में अपने कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़फोड़ मचा सकते हैं - लेता है और राज्य सरकार इस कदर लाचार है कि खुद मुख्यमंत्री बिचौलिए की भूमिका निभाता है , बजाए धमकी देने वाले के खिलाफ कोई एक्शन लेने के ।
शाहरुख ने इससे पहले भी स्टैंड लिया । आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के खेलने को लेकर । आईपीएल के पीछे बीसीसीआई थी , बड़े उद्योगपति थे , लेकिन सेना की धमकी के बाद किसी ने भी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को लेने की हिम्मत नहीं दिखाई । माई नेम इज खान के समय भी उन्होंने स्टैंड लिया । क्या हुआ ? दिलवाले का कितना विरोध हुआ ? किस हद तक दुष्प्रचार हुआ ?
शाहरुख खान एक कलाकार है , एंटरटेनर है , वह किसी रीजनीतिक गुंडे से भीड़ना - वह भी तब जब शासन उसके साथ है - उसके बस की बात नहीं ।
और जो लोग "रईस " के डायलोग "मियाँ भाई की डेयरिंग " को उद्धृत कर उसका मजाक उड़ा रहे हैं , उन्हें बता दूँ कि यह डायलॉग एक माफिया बोलता है , जो असल जिंदगी में शाहरुख नहीं है । शाहरुख की असल डेयरिंग है कि उसने फिल्म बैकग्राउंड से न होने के बावजूद हिरो बनने का सपना देखा और कामयाब हुआ । स्टार पुत्र न होने के बावजूद स्टार बना । शाहरुख की डेयरिंग यह है कि उसने तब नकारात्मक भूमिकाएँ कि जब यह फैशन नहीं था और हिरो अपनी इमेज से बाहर नहीं जा पाते थे । शाहरुख की डेयरिंग यह है कि वे स्टार होने के बावजूद स्वदेश, चक दे इंडिया , डियर जिंदगी जैसी फिल्में करते हैं ।
कोई शख्स लड़ते लड़ते हार गया तो इसका यह मतलब नहीं कि वह लड़ा ही नहीं । कोई थक कर झूक गया तो इसका यह मतलब नहीं कि वह कभी खड़ा नहीं हुआ । मुझे शाहरुख से ज्यादा अपने देश पर तरस आ रहा है ।





रविवार, 11 दिसंबर 2016

रीढ़विहीन रीढ़विहीन बैंकर

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने एक बैंक विशेष ( वही बैंक जिसे महाराष्ट्र के लोग आमची बैंक कहते हैं और बैंक विशेष के ब्रांच को बैंक नहीं मुहल्ले का किराना दुकान समझतेहैं और उस बैंक के कर्मियों को घर का छोटू ) को कुछ बड़े स्टेशनों पर नोट बदली के लिए काउंटर खोलने के लिए कहा । विडंबना देखिए कि बैंक मान गई और रेलवे ने सुरक्षा का हवाला देते हुए बात नहीं मानी ।
जबकि बैंक को ऑब्जेक्शन लेना चाहिए । रेलवे स्टेशन और वह भी चर्चगेट और सीएसटी जैसे स्टेशन पर काउंटर खोलने के लिए बैंक को कई तरह के इंतजाम करने पड़ेंगे । नकद की सुरक्षा भी बड़ा मसला है । बैंक कर्मियों को सुरक्षा - भीड़ के उग्र होने की स्थिति में जो रेल प्लेटफॉर्म जैसी जगहों पर बैंक के मुकाबले ज्यादा उन्मादी हो सकती है । - का मसला भी है । इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं ।
रेल को सिर्फ जगह उपलब्ध करानी थी , लेकिन उसके लिए भी उन्होनें अनुमति नहीं दी । लेकिन बैंक आसानी से मान गई ।
वजह यह है कि बैंकरों ने अपनी रीढ़ की हड्डी और आवाज खो दी है । वे तो इसी पर फूल कर कुप्पा हो गए होंगे कि मुख्यमंत्री की फरमायश है और उन्हें खुश करने का एक मौका मिला है । वे यस सर पहले बोलते हैं और होगा कि नहीं यह बाद में सोचते हैं ।
यह स्थिति लगभग सभी बैंकों की है । आश्चर्य नहीं कि बैंकरों ने अपना सम्मान और महत्व दोनों खोया है ।
अफसोस !
#बैंक_बैंकर

नए नोट की जब्ती

कई जगहों से नए नोटों के जखीरे पकड़े जा रहे हैं । इसके लिए बैंक वालों को दोषी करार दिया जा रहा है । अगर इसमें बैंकरों की संलिप्तता पाई जाती है तो उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए । दोषी बैंकरों का न तो बचाव करना चाहता हूँ और नही उन्हें बचाए जाने समर्थन करता हूँ ।
फिर भी कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ ।
- जिस तरह इन घटनाओं का हवाला देकर विमुद्रीकरण की असफलता का ठीकरा बैंकरों पर फोड़ने की कोशिश की जा रही है , वह हास्यास्पद है और साजीशन है । आश्चर्य नहीं कि ऐसा करने वाले पार्टी विशष के समर्थक हैं जो विमुद्रीकरण पर संकटों में घिरी सरकार को निकालने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ।
- जब्त किए गए रुपए बहुत बड़ी मात्रा लग रहे हों तो इसे चलन में नोट वापसी की जाने वाली मुद्रा के मुल्य से तुलना कीजिए तो पाएँगे कि वह नगण्य राशि लगेगी । इसलिए इसे आधार बनाकर पुरी असफलता का ठीकरा बैंकरों पर फोड़ना उचित नहीं ।
- बैंक में चेक और काउंटर चेक का जबरदस्त सिस्टम है । कोई भी सिस्टम को बाइपास नहीं कर सकता है । करता है तो वह ट्रेल छोड़ता है जिसे ट्रेस किया जा सकता है और स्क्रुटिनी में टिकेगा नहीं । उनका पकड़ा जाना महज वक्त की बात है । कई बैंकरों पर कार्यवाई भी हुई है ।
- ये जो नोट पकड़े जा रहे हैं , ऐसा इसलिए कि बैंक ट्रांजेक्शन संबंधी डाटा बैंकों द्वारा कर विभाग को उपलब्ध कराया जाता है । वे डाटा माइनिंग द्वारा अपने काम की सूचना निकालते हैं । किसी तरह का संदेह होने पर नोटिस भेजते हैं , छापा मारते हैं , आदि जो कि उनका काम है । इसलिए इन जब्तियों में और दोषियों को पकड़वाने में बैंक का भी य़ोगदान है । इसलिए सिर्फ बैंकरों पर दोष ही मत डालिए ।
- सवाल है कि नए नोट दोषियों के पास इतनी मात्रा में कैसे आए ? संभव है ऐसा डमी खातों के माध्यम से किया गया हो । मतलब अपने कर्मचारियों/रिश्तेदारों के नाम पर पहले से खोले गए कागजी फर्मों के नाम पर । जरुरी नहीं कि इसमें बैंकरों की मिलीभगत हो ही ।
बैंक हमेशा से फ्रॉड लोगों के निशाने पर रहता है । उन्हें बैंक के कामकाज की अच्छी जानकारी होती है । वे हमेशा नए और अनोखे तरीके फ्रॉड के लिए लाते रहते हैं । बैंक कभी बचती है, कभी फंसती है और तद्नरुप सिस्टम/प्रोसीजर अपडेट करती है । बैंकरों और फ्रॉड लोगों के बीच चोर सिपाही जैसा चलता रहता है । पकड़े गए लोग ही बताएँगे कि कैसे यह कारनामा किया और बैंक उसके बाद सुधार लाएगी । यह तय है कि ये घटनाएँ अपवाद हैं । नॉर्म नहीं ।
#बैंक_बैंकर

बुधवार, 16 नवंबर 2016

मर्द का रोना

मर्द होने की अपना मजबूरियाँ होती हैं , वह खुल कर रो भी नहीं सकता । रोती हुई औरत सहज संवीकार्य है, लेकिन मर्द का रोना सहज नहीं माना जाता । उसे नौटंकी माना जाता है है या उसके नामर्द होने की निशानी । मौगा का खिताब तो मिल ही जाता है । वह उपहास का पात्र होता है ।
औरत को दुख होता है , वह रो देती है और उसे सहानुभूति मिलती है । मर्द को दुख होता है तो रोता नहीं , गुस्सा कर गालियाँ देता है । बदले में उसे और परेशानी होती है ।
यह नहीं कहा जा सकता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे पुरुष को डर नहीं लगता है या उसे असुरक्षा का अहसास नहीं होता है । दरअसल वे कहीं ज्यादा अकेले होते हैं । वे किसी पर भरोसा नहीं कर पाते । उन्हें अपने सिपाहसलारों से भी बच कर रहना पड़ता है । जब वे कमजोर पड़ते हैं , उन्हें भावनात्मक सहारे के लिए कोई नजर नहीं आता ।
अकेला व्यक्ति क्रुर होता जाता है । और क्रुर व्यक्ति अकेला होता जाता है ।
मोदी के रोने की खबर पर आए ख्याल । लेकिन यह पोस्ट मोदी के बारे में नहीं है । न उसके समर्थन में और न विरोध में । सामान्य कथन है ।
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शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

बैंकर और सैनिक

चूँकि इन दिनों हर बात में सेना और सैनिकों का हवाला दिया जा रहा हा , इसलिए सेना का ही उदाहरण देता हूँ । कल्पना कीजिए - मोदी एक दिन अचानक युद्ध का ऐलान करते हैं और सेना को पाकिस्तान पर हमला करने के लिए कहते हैं । पुरे देश के साथ सेना भी चकित है । सेना आपात स्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहती है , लेकिन युद्ध पर जाने के लिए भी कुछ तैयारी करनी पड़ती है । मसलन टुकड़ी को सीमा पर लगाना , टैक, विमान आदि सीमा के करीब वाली चौकी पर पहुँचाना । बैक अप तैयार करना आदि । लेकिन मान लीजिए सेना को बिना तैयारी के युद्ध में झोंक दिया जाए तो कैसी अफरा तफरी मचेगी ।
इसलिए तनाव की स्थिति होते ही सेना को अलर्ट जारी किया जाता है । सैन्य प्रमुखों को भरोसे में लिया जाता है ।
बैंक में बड़े नोट बैन करके जैसे बिना तैयारी के बैंक कर्मियों और जनता को अधर में लटका दिया गया है । बैंको को इसकी न जानकारी थी । चलिए गोपनीयता के लिए जानकारी नहीं दी गई माना जा सकता है । लेकिन नोटों की आपुर्ति ही नहीं है तो बैंक कर्मी क्या करेंगे ? यह बिल्कुल ऐसा है जैसे सेना को बिना गोला बारुद के युद्ध में झोंक दिया जाए । काम के बोझ से परेशानी नहीं है , लेकिन यकीन मानिए जितनी देर एक ग्राहक को यह समझाने में लगता है कि क्यों पेमेंट नहीं कर सकते, उतनी देर में तीन ग्राहकों को भूगतान कर सकते थे, यदि नोटों की व्यवस्था होती !
अब दूसरी बात । सेना को आज्ञा कारी और हर हाल मेें आदेश मानने की ट्रेनिंग और प्रावधान है । लेकिन कुछ मौकों पर सेना ने सरकार की ईच्छा का विरोध किया है और आदेश मानने में असमर्थता जताई है । जैसे - पुर्व गृहमंत्री नक्सलियों के खिलाफ सेना उतारना चाहते थे और तत्कालीन सेना प्रमुख ने विरोध जताया था और यह बेल मुंडेर नहीं चढ़ी । स्मृति के सहारे लिख रहा हूँ । लिंक गुगल कर लें ।
यह उदाहरण इसलिए दिया कि लोकतंत्र में शासक अपनी मनमर्जी नहीं कर सकता है । निश्चय ही सरकार के पास नीतिगत फैसले की ताकत हैं, लेकिन जिन संस्थाओं को इन फैसलों का क्रियान्वन करना है , उन्हें भी प्रक्रिया में शामिल किया जाता है । उनकी आपत्तियों , सुझावों को संज्ञान लिया जाता है । और यह संस्थानों की भी जवाबदेही है । खुद भूतपुर्व आरबीआई गवर्नर ने खुले आम सरकार की कई मंशाओं का सार्वजनिक विरोध किया क्योंकि वे उसे सही नहीं मानते थे और उनके रहते हो भी नहीं पाया । जैसे रेट कम करना आदि जो उनके जाते ही नए गवर्नर द्वारा मान लिया गया ।
अब बैंक के टॉप मैनेजमेंट और उनकी संस्था आईबीए को परखते हैं । लगता है वे सरकार के सामने यस सर के अलावा कुछ नहीं बोल पाते । बैंक में नोट बदलने से लेकर जन धन , मुद्रा , एपीवाई आदि सबमें जब योजनाएँ लागू हुईं तो बैंक के पास स्पष्ट दिशा निर्देश तक नहीं थे । जो समय सीमा और लक्ष्य दिए गए वे अव्यावहारिक थे । , और मेरे ध्यान में ऐसा कोई बयान तक याद नहीं आता जिनमें बिना तैयारी के योजना लागू करने की आलोचना की गई हो यो तैयारी के लिए पर्याप्त समय की माँग की गई हो या इसके लिए दवाब बनाया गया हो । आपके ध्यान में है तो कृपया मेरी जानकारी बढ़ाएँ । ऐसा लगता है कि बैंक - जो कि फिलहाल सरकार की सभी महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करने वाली प्रमुख एजेंसी है - ने अपनी बारगेनिंग पावर खो दी है ।योजना का क्रियान्वन करने वाली संस्था को अंधेरे में रखकर ,

उन्हें बिना पर्याप्त साधन और समय दिए योजना की सफलता की उम्मीद नहीं की सकती ।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

एनडीटीवी पर प्रतिबंध



मैने एक अर्से से टीवी ही नहीं देखा, इसलिए कोई भी न्यूज चैनल नहीं देखता हूँ । इसलिए विभिन्न न्यूज चैनलों के बारे में अखबारों और फेसबुक मित्रों की पोस्ट से ही पता चलता है । इसलिए भिन्न चैनलों के कंटेंट पर साधिकार कुछ नहीं कह सकता हूँ ।
हाल में एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध लगाया गया है । कारण बताया जा रहा है कि उसने पठानकोट हमले के दौरान गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता की और भारत की सुरक्षा से संबंधित जानकारी पब्लिक में ले आए जिससे सेना को नुकसान हुआ । एक तरफ पत्रकार बिरादरी में ज्यादातर लोग इसे अघोषित आपातकाल की निशानी बता रहे हैं तो भाजपा समर्थक खुशियाँ व्यक्त कर रहे हैं ।
पहली बात यह है कि यदि आरोप सच नहीं लगते । यह बिल्कुल ऐसा लग रहा है जैसे किसी बड़ी चूक को ढँकने के लिए आसान टार्गेट चुना गया है । पठानकोट एयरबेस की सुरक्षा की जिम्मेदारी सैन्य बलों की है । क्या उसके लिए किसी तरह की जवाबदेही तय की गई है ? क्या जाँच का परिणाम जनता को बताया गया है ?
दूसरे - बताया जाना चाहिए कि किस तरह एनडीटीवी की रिपोर्टिंग ने सुरक्षा को खतरे में डाला और अन्य चैनलों की रिपोर्टिंग क्या इस दोष से मुक्त है ? किस आधार पर एनडीटीवी को दोषी पाया गया और अन्य चैनल दोषमुक्त पाए गए ? और एक दिन के प्रतिबंध के बजाए आर्थिक दंड आदि के विकल्प पर विचार किया गया क्या ?
मीडिया से मुझे बतौर उपभोक्ता मुझे शिकायते हैं , लेकिन इस कारण सरकार द्वारा मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशों का समर्थन नहीं कर सकता हूँ । जो लोग प्रतिबंध पर खुशियाँ जता रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि वे इसे पाकिस्तानी चैनल , देशद्रोही मानते हैं , शायद नहीं समझते कि न्यूज सिर्फ वह नहीं है जो सरकार बताए , न्यूज वह भी है जो सरकार के खिलाफ हो । देशहित के नाम पर यदि लोकतंत्र के आधार स्तंभों - जिनमें मीडिया भी एक है - पर इसी तरह हमले होते रहे तो देश इससे कमजोर ही होगा ।
स्वतंतर मीडिया के पक्ष में , प्रतिबंध के खिलाफ मेरा विरोध दर्ज किया जाए ।