शुक्रवार, 17 जून 2016

मंत्री की आलोचना



गुजरात के शिक्षा मंत्री की आलोचना हो रही है कि उन्होने एलीफेंट की स्पेलिंग गलत लिखी। ईमानदारी से कहूँ कि खबर पढ़ने के बाद मैंने याददाश्त के सहारे एलीफेंट की स्पेलिंग कहना चाहा पर तुरंत याद नहीं कर पाया । डिक्शनरी देखनी पड़ी ।
सच पूछिए तो इन दिनों ऑटो करेक्ट/स्पेलिंग चेक के कारण लोग इतना ध्यान ही नहीं देते।सुविधा का साइड  इफेक्ट है जैसे मोबाइल आने के बाद किसी का फोन नंबर याद नहीं रहता । छात्र जीवन के बाद जो सायास पढ़ने लिखने से नहीं जुड़े हैं, उनका सामान्य ज्ञान, भाषा ज्ञान धुंधला पड़ता जाता है। ऐसा होना कोई अपराध नहीं है , भले ही यह स्थिति वांछनीय न मानी जाए।बेहतर है हमारे नेताओं की आलोचना ऐसे नॉन -इश्यूओं को लेकर न हो, वरन ठोस नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर हो जिनसे हमारा आपका जीवन प्रभावित होता है।

फिल्म उड़ता पंजाब



इन दिनों ट्रेलर इतने जबर्दस्त बनते हैं कि जब फिल्म देख कर निकलते हैं तो लगता है ट्रेलर ही अच्छा था , फिल्म बेकार बनाई । सुखद एहसास हुआ कि "उड़ता पंजाब" को लेकर जितना हाइप हुआ, फिल्म उस अनुरूप बढ़या बनी है।
पंजाब की ड्रग्स समस्या को लेकर रियल लाइफ ड्रामा। फिल्म ड्रग पॉलिटिक्स से ज्यादा उन चार किरदारों पर फोकस करती है जिनकी जिंदगियाँ ड्रग से अलग अलग ढंग से जुड़ी हुई है।
एक पुलिस वाला जो ड्रग माफिया से पैसे खाकर आँख मूँद लेता है , लेकिन खुद का भाई जब शिकार होता है तो उसका नजरिया बदल जाता है । एक डॉक्टर जो ड्रग एडिक्ट का इलाज करती है और ड्रग नेक्सस उजागर करती है । एक सिंगर जो ड्रग के कसीदे पड़ता है और खुद एडिक्ट है , लेकिन जब ड्रग के खिलाफ बोलता है तो कोई सुनना नहीं चाहता । एक खेत मजदूर जो इत्तिफ़ाक से ड्रग डीलरों के हत्थे पड़ जाती है।
घटनाक्रम विश्वसनीय है और उन्हे इसी तरह फिल्माया गया है। ड्रग एडिक्टों को देखकर ड्रग से वितृष्णा होती है। फिल्म में गालियों की भरमार है लेकिन इतनी गालियां तो बाजार में एक चौक से दूसरे चौक तक जाने में ही सुनाई देंगी, शायद ज्यादा ही । बाकी पंजाब के नाम को लेकर जितना विवाद हुआ ,वैसी आपत्ति कभी गोवा, बिहार, हरयाना , यूपी , मुंबई आदि को लेकर नहीं हुई , जहां के अपराध,घोटाले, हत्याकांड बार बार फिल्मों के विषय बने हैं । भला हो कोर्ट का जिनके सदके फिल्म बिना कट के रिलीज हुई ।
फिल्म देख लीजिये लेकिन हौल में, लीक वाली नहीं। स्टार पावर के बजाय कंटेन्ट पर फोकस करने वाली फिल्मों को बढ़ावा दीजिये।

बुधवार, 15 जून 2016

शिक्षा मंत्री से सवाल

आदरणीय शिक्षा मंत्री !
इतना ही बता दीजिये कि जब शिक्षा और उच्च शिक्षा के नाम पर अधिभार ( सेस ) वसूला ही जा रहा है तो फिर यूजीसी के बजट में कटौती क्यों हुई ? कई स्कोलरशिप को बंद करने का प्रयास क्यों हुआ !? और सेस से वसूला गया पैसा कहाँ और किस तरह इस्तेमाल हो रहा है ?
यह भी बताइये कि उच्च शिक्षा और शोध कार्य को बढ़ावा देने के लिए कौन से कदम उठाए जा रहे हैं?
प्राथमिक शिक्षा और सरकारी स्कूलों को पटड़ी पर लाने के लिए क्या प्रयास कर रही हैं?
कुकुरमुत्ते की तरह उग आए प्राइवेट कोलेजों पर लगाम लगाने के लिए क्या कर रही हैं ?
व्यापम जैसे घोटाले दुबारा न हो इसके लिए कौन से उपाय कर रही हैं ?
सवाल तो बहुत हैं । कहीं महोदया यह न कह दें कि तुम जनता हो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मंत्री से सवाल करने की ?

मेरे बहुजन मित्रों – खूब लिखिए !



मेरे बहुजन मित्रों – खूब लिखिए !

खबर है कि मायावती ने जिला स्तर के एक बसपा नेता को पार्टी से इसलिए निष्काषित कर दिया क्योंकि उन्होने ब्राह्मण के खिलाफ़ कोई पोस्ट किया था। मैंने पोस्ट पढ़ी नहीं इसलिए उस पोस्ट पर बात नहीं कर सकता ।
स्पष्ट कर दूँ कि मैं ब्राह्मणों से सिर्फ ब्राह्मण होने के कारण घृणा करने का समर्थक नहीं हूँ। तथ्यहीन और तर्क विहीन ब्राह्मण विरोध को सही नहीं मानता ।लेकिन समाज में जो वातावरण है उसमें बहुजनों का ब्राह्मणवादी विचार और संस्कृति से टकराव अवश्यंभावी है। प्रायः देखा गया है कि बहुजनों द्वारा जाति पर लिखते ही या ब्राह्मण वर्चस्व का विरोध करने पर ही उन्हें सवर्णों द्वारा जातिवादी घोषित कर दिया जाता है । खुले आम पोस्ट पर गाली गलौच, जातीय दंभ का प्रदर्शन होता है । उदाहरण के लिए दिलीप मण्डल, वेद आदि के पोस्ट के कमेन्ट को देखा जा सकता है। बहुजनों के अधिकांश लोगों ने पढ़ना लिखना तो अब शुरू किया है। सवाल उठाना शुरू किया है । एक दलित नेत्री द्वारा उन आवाजों को बंद करना- चाहे जो भी राजनीतिक मजबूरी रही हो- सही नहीं है ।
सबको साथ लेकर चलना चाहिए , ब्राह्मणों समेत सवर्णों को भी । यह एक आदर्श और स्वागत योग्य विचार है जिसका विरोध संभव नहीं है । लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ब्राह्मण वर्चस्व को स्वीकार कर लिया जाये या उसके सामने समर्पण कर दिया जाये । उन्हे चुनौती दिये बगैर हमारी मुक्ति संभव नहीं है ।
इसलिए , मेरे बहुजन मित्रों , खूब लिखिए । बिना डरे, बिना अंजाम और आलोचना की परवाह किए ।

गुरुवार, 9 जून 2016

मेरे बहुजन मित्रों - सवर्णों से मित्रता



मेरे बहुजन मित्रों !

हमें समाज के हर तबके से मित्र बनाने चाहिए । किसी को इस आधार पर नकारा नहीं जाना चाहिए कि वह सवर्ण है। किन्तु यह ध्यान रहेकि उनकी मित्रता उतनी कीमती नहीं कि अपनी पहचान, अपनी स्वतन्त्रता , अपने स्वाभिमान से समझौता करें ।
आप माँस खाते हैं तो खाइये । न तो – हम  मांस क्या लहसुन, प्याज भी नहीं खाते –कहकर खुद को श्रेष्ठ मानने वाले ब्राह्मणों के सामने मांस खाने के लिए अपराधबोध की जरूरत है, न ही –हम ब्राह्मण होकर भी सब मांस खाते हैं – कहकर खुद को क्रांतिकारी मानने वालों से अतिरिक्त सदाशयता की जरूरत है।
आप को जाति और धर्म से संबन्धित चर्चा से इसलिए मत बचिए कि आपके सवर्ण मित्र असहज होते हैं । ये मुद्दे हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं , उनके लिए नहीं । वे हमारे राजनीतिक/सामाजिक विचारों के बाद भी हमारे मित्र बने रहें तो स्वागत  हैं, वरना उन्हे जाने दें ।
सवर्णों के बीच अपनी स्वीकार्यता के लिए बहुत आग्रही मत होइए । जिनके मन में आपके अस्तित्व से ही घृणा है ,आप मर कर भी उन्हे खुश नहीं कर सकते। न ही ऐसा करने की  जरूरत है। अतएव उनके लिए  उनके मापदंड के हिसाब से खुद में बदलाव लाने की जरूरत नहीं ।
आपके आइकॉन –चाहे अंबेडकर हों, कबीर हों,- उनके लिए उपहास के पात्र हैं। लेकिन उनके सामने न तो आपको शर्मिंदा होने की जरूरत है और न ही कोई सफाई देने की जरूरत है। अपने आइकॉन के लिए प्रेम और सम्मान खुल कर दिखाइए ।
आपके पहनावे, आपके रंग, आपके रहन  सहन आदि का मज़ाक बनाया जाये तो सहन न करें । करारा जवाब  दें । वे भले ही इंकार करें , इन मज़ाक की जड़ें उनके जातिगत उच्चता की ग्रंथि में छुपी होती हैं। इसकी वजह से दोस्ती टूटती है तो टूटने दें ।
अपने लिए प्रेम और स्वाभिमान रखिए !
#मेरे_बहुजन_मित्रों


मंगलवार, 7 जून 2016

प्रोफेसर और असोसिएट प्रोफेसर के पदों में ओबीसी आरक्षण रद्द !



जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है वर्तमान मोदी सरकार को दरअसल संघ सरकार है आरक्षण खत्म करने या निष्प्रभावी करने पर तुली हुई है। एससी/एसटी के आरक्षण को हाथ लगाना थोड़ा मुश्किल है , इसलिए हमला ओबीसी पर है । अफसोस यह एक पिछड़े -मोदी-को आगे करके किया जा रहा है। इस बारे मे मोदी का आश्वासन खोखला है। संघ के हजार मुंह है और हजार तरह से बोल कर भ्रमित करती है और अपने अजेंडे पर चलती है ।
स्मृति ईरानी जो शिक्षा मे संघ का एजेंडा लाने में लगातार जुटी हैं ने निर्देश जारी किया है जिसके तहत प्रोफेसर और असोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए ओबीसी आरक्षण खत्म कर दिया गया है। इस पर मीडिया में चर्चा नहीं हो रही । सवाल यह भी है कि क्या सरकार हठात इस तरह आरक्षण हटा सकती है!?
कारण क्या बताया गया है!? क्सिकी अनुशंसा पर ऐसा फैसला किया गया है!?
हमारे ओबीसी लीडर प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले सवर्णों को रिझाने में लगे हैं। ओबीसी वर्ग "हिन्दू राष्ट्र" के निर्माण में व्यस्त है और यह सवाल नहीं पूछ रहे  कि हिन्दू राष्ट्र में उनकी भूमिका क्या होगी!? इस्तेमाल किया जाना और किनारे कर दिया जाना !??इसमें कोई शक नहीं कि वे बस प्यादे की तरह इस्तेमाल होने वाले हैं !
ये विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थाएं ब्राह्मणवाद के सबसे बड़े अड्डे हैं। शुक्ला , सिंह, सिन्हा और बिरादरी का कब्जा है । किसी योग्यता की वजह से नहीं , बल्कि भाई भतीजा वाद और जातिवाद के कारण। प्रोफेसरों को अपने बेटे, बेटियों, बहुओं, भतीजों, चेलों को अभयदान रहता है - पीएचडी कर लो, नेट निकाल लो , फिर हम हैं ही !अगर उनका कुत्ता बोल सकता यो वे उसे भी लेक्चरार बना सकते हैं । तदर्थ सेवाएँ भी उन्होने अपने बिरादरी में ही बांटी है । घुसने में इतना अड़ंगा है तो आगे बढ्ने में कितना लगाते होंगे यह सहज ही सोचा  जा सकता है ।
ओबीसी वर्ग को ध्यान रखना चाहिए कि एससी/एसटी उनके स्वाभाविक सहयोगी है और कथित सवर्ण उनके प्रतिद्वंदी ! संसाधनों और अवसरों पर कब्जा सवर्ण तबके का है, और ओबीसी के सीमित अवसर के लिए एससी/एसटी और उनका आरक्षण जिम्मेदार नहीं हैं । सवर्ण है।
जरूरी है कि यह लड़ाई सड़क, संसद , कोर्ट , मीडिया , हर जगह लड़ी जाये । वरना जो थोड़ा सा स्पेस ओबीसी के लिए बना है हम उसे भी गवां देंगे ।यह हाराकिरी कहलाएगा !
#मेरे_बहुजन_मित्रों