सोमवार, 2 मई 2016

मेरे बहुजन मित्रों -जातिवाद खत्म नहीं हुआ है !



जातिवाद तो खत्म हो गया है !?
जब भी जाति पर कोई पोस्ट डालता हूँ , ढेर सारे लोग कहने आ जाते हैं – जातिवाद तो खत्म हो गया है !मुझे हैरत नहीं होती जब देखता हूँ ऐसा कहने वाले लगभग सभी सवर्ण होते हैं !
यह तब है जब कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब अखबार में दलित पर होने वाले अत्याचार से संबन्धित खबर नहीं छपती ! ऐसा नहीं है कि ये खबरें लोकल अखबारों में छपती हैं ! नेशनल डेली भी इन खबरों से भरा रहता है !साथ में दर्ज होता है प्रशासन द्वारा संगठित उपेक्षा !
कई सर्वे के नतीजे जो इनही अखबारों में छपते हैं , बताते हैं कि परिवर्तित रूप में छूआछूत आज भी जारी है !शासन और संवैधानिक निकायों में इनकी उपस्थिती कम है !
खुद शहर/गाँव में घूमने निकलिए !खुद ही लोगों से बात कीजिये !दस मिनट की बातचीत में गहरे धंसा हुआ जातिवाद सतह पर तैरने लगेगा !
फेसबुक पर ढेर सारे सवर्णों की प्रोफाइल देखिये, जहां वे घृणित भाषा में दलितों ( और मुसलमानों के भी ) के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं !भूमिहार समाज/परशुराम सभा /राजपूत राज करेगा –आदि नाम से ढेर सारे पोस्ट/फोटोशोप वायरल होते रहते हैं जिसमें सवर्णों के जातीय गौरव का गुणगान भरा होता है और दलितों/पिछड़ों के प्रति जहर !
लेकिन  डिकास्ट होने का दावा करने वाले हमारे सवर्ण मित्रों को यह दिखता ही  नहीं है , विरोध करना तो दूर की बात है !दरअसल देख कर आँख बंद कर लेने वालों को कोई कुछ नहीं दिखा सकता है !उन्हे दिखाना और मनवाना हमारा मकसद भी नहीं होना चाहिए !
मेरे बहुजन मित्रों ! वे इंकार कर सकते हैं , हम इंकार नहीं कर सकते !हमारे लिए जातिवाद की पहचान और  उसका प्रतिकार जरूरी है !

रविवार, 1 मई 2016

मेरे बहुजन मित्रों - श्रम का सम्मान करें !

भारत में व्याप्त ब्राह्मणवादी /वर्णवादी व्यवस्था ऐसी है कि यहाँ शारीरिक श्रम करने वाला हेय दृष्टि से देखा जाता है !गौर कीजिये हिटने भी श्रम और कुशलता से जुड़े कारोबार/रोजगार हैं और उनसे जुड़े लोग हैं वे दलित या पिछड़े माने जाते हैं !
चमड़ा बनाने वाला , उससे जूते आदि बनने वाला दलित अछूत !
बाल बनाने वाला दलित !
कपड़ा बुनने वाला दलित !
बांस से डलिया/चटाई आदि बनाने वाला अछूत दलित
लोहे के हथियार/औजार बनाने वाला पिछड़ा !
मूर्तियाँ बनाने वाला पिछड़ा !
पशुपालन करने वाला पिछड़ा !
आदि !
मेरे बहुजन मित्रों !लानत भेजिये इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था और कथित सवर्णों पर जो आपको खुद से, खुद के हुनर से , और अपने जैसे दूसरे हुनरमंदों से घृणा करना सिखाते हैं !अपना , अपने श्रम का साथ में दूसरे के श्रम/कौशल का सम्मान कीजिये !
#मेरे_बहुजन_मित्रों


शनिवार, 19 मार्च 2016

भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच

हे भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम !
आप लोगों को पाकिस्तान के खिलाफ आज का मैच जितना ही होगा !इसी से भारत के लोगों की देशभक्ति और युद्धोन्माद की तुष्टि होती है !वे चाहते तो पाकिस्तान के साथ युद्द हैं, लेकिन फिलहाल मैच मे हराकर ही संतुष्ट हो जाएँगे !
फिर टूर्नामेंट में कॉर्पोरेट हितों की सुरक्षा के लिए जो अरबों रुपए खर्च हुये हैं उनकी वसूली के लिए जरूरी है कि भारत कम से कम फाइनल तक पहुंचे !भारत फाइनल में पहुंचा नहीं तो टूर्नामेंट के बाकी मैच कौन देखेगा!? यूरोप वाले देखते नहीं ! अमेरिका वाले देखते नहीं !अफ्रीका वाले देखते नहीं !भारत ही है जहां मैच देखते हुये लोगों के हलक मे कोल्ड ड्रिंक, चिप्स,टी शर्ट , सब उड़ेला जा सकता है !है तो क्रिकेट व्यवसाय , लेकिन खेल का भ्रम भी बनाए रखना जरूरी है इसलिए फेयर मैच कराना जरूरी है , वरना सभी ट्रॉफी तो भारत की झोली मे ही डाल दिया जाता , आखिर सबसे ज्यादा पैसा और पावर बीसीसीआई के पास है !
आपके लिए भी पाकिस्तान को हराना जरूरी है ताकि कप न जीते तो कोई सवाल न हो ! यह भी नहीं पूछ जाएगा कि क्यों आपलोग अफ्रीका , आस्ट्रेलिया मे अक्सर पिटकर आते हैं !
और हाँ देशभक्ति का नया टेस्ट भी देना मत भूलिएगा !ज़ोर से नारा लगाइएगा -भारत माता की जय ! नारा मैच भले ही न जीता सके लेकिन जो मैच हार गए तो देशभक्तों के हाथों जान गवाने से बच जाएँगे !शायद !!
:-) :-P

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

फर्क पड़ता है !

वे कहते हैं - लिखने से कुछ नहीं होता !
फिर लिखने वालों के पीछे भाड़े के गुंडे रियल /वर्चुअल दोनों जगह पर दौड़ा देते हैं !
वे कहते हैं -नारा लगाने से कुछ नहीं होता !
फिर नारा लगाने वालों पर मुकदमा दायर कर देते हैं !
वे कहते हैं -धारणा प्रदर्शन से कुछ नहीं होता !
फिर धारणा /प्रदर्शन पर लाठी चार्ज करवा देते हैं !
मतलब वे कुछ भी कहें , लिखने से फर्क पड़ता है !
नारों से फर्क पड़ता है !
प्रदर्शन से फर्क पड़ता है !
:-) :-)

कौन सी माता !? कैसी माता !??

कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















कौन सी माता !? कैसी माता !??
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देश की कल्पना एक माँ के रूप मे करना और उसकी पूजा करना एक भावात्मक विचार है !इसमें कुछ भी गलत नहीं है !साम्य यह है कि जैसे माँ जन्म देती है लालन पालन करती है उसी तरह हम इस देश में पैदा हुये , पले बढ़े और जी रहे हैं !देश के लिए भावात्मक लगाव विकसीत करने के लिए , बच्चों को समझाने के लिए , युद्ध आदि के समय भावात्मक ज्वार पैदा करने के लिए उचित है !
लेकिन जरूरी नहीं कि सभी इससे सहमत हों और देश और उससे सम्बन्धों को इसी तरीके से समझे और माने !सच्चाई यह है कि भारत एक देश है और हम इसके नागरिक !तर्क और विवेक की दृष्टि से यही सही है !देश हमारी माँ और हम उसके बच्चे -यह हर किसी के गले के नहीं उतर सकता और न ही इस बारे में जबर्दस्ती की जा सकती है , न ही की जानी चाहिए !
भारत में प्रचलित हिन्दू धर्म और संस्कृति में देश के अलावा नदी ( गंगा ) , पौधा (तुलसी ) , धरती , गाय आदि को भी माँ कहा जाता है !लेकिन दूसरे धर्म के लोगों की बात तो जाने दीजिये नास्तिक और वे हिन्दू भी जो कर्मकांडों और परम्पराओं ले प्रति बहुत आग्रही नहीं है , इन मान्यतओं को अधिक महत्व नहीं देते हैं !उनके लिए गाय एक उपयोगी पशु है भैंस और कुत्ते आदि की ही तरह !तुलसी एक औषधीय गुणो वाला पौधा है !गंगा एक नदी है !
जो इन्हे माँ मानते हैं , उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए !लेकिन सम्मान करने का यह मतलब नहीं कि उन्हे यही धारणा सभी पर मढ़ने और जबरदस्ती मनवाने की छुट दी जाये !
यही बात " भारत माता" के लिए भी सही है !अगर कोई देश को माँ मानता है ,उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करता है , जयकारा लगाता है तो यह उसका अधिकार है ! लेकिन इसे सभी पर थोपने , इसके अनिवार्य बनाने , एतराज/इंकार करने वालों पर प्रतिबंध/निष्कासन आदि की कोशिश का विरोध होना ही चाहिए ! जबर्दस्ती " भारत माता की जय " कहने के लिए कहेंगे तो हम भी पुछेंगे -कौन सी माता !? कैसी माता !? भारत हमारा देश है और हम इसके नागरिक !हम बस यही संबंध जानते और मानते हैं !


















सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अपने से शायर - निदा फाजली

फेसबुक पर खबर है कि निदा फाजली नहीं रहे !निदा फाज़ली एक अपने से शायर थे जिनहे पढ़ना और किनकी गजलें सुनना बेहद पसंद था !कई गजलें थी जिन्हे पढ़के लगा कि बस वे मेरे दिल की ही बात कह रहे हैं !कई शेर ऐसेजो बुरे वक्त मे हौसला देते है !शायर कभी नहीं मरते वे हमेशा जिंदा रहते हैं अपने नज़मों, शेरों में , हमारे दिलों में !
कुछ शेर ( स्मृति से )
बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत चुका है वह गुजर क्यों नहीं जाता !
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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हँसाया जाये
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अपना ग़म लेकर कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये
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जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
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समझते थे फिर भी नहीं रखी दूरियां हमने
चिरागों को जलाने में जला ली उँगलियाँ हमने
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आदमी बनना आसाँ न था
शेख जी पारसा हो गए
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

सफलता के मानदंड अलग अलग होते हैं !

सफलता के मानदंड अलग अलग होते हैं !आप किसी भी मुकाम पर रहे कुछ लोगों के लिए आप सफल होते और कुछ लोगों की नज़र मे असफल !आप खुद की नज़र मे भी कभी खुद को सफल पाते हैं और कभी असफल !यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी खुद से अपेक्षाएँ क्या है और आपकी प्राथमिकताएँ क्या हैं !
निजी संदर्भ में देखूँ तो मैं कई लोगों की नज़र मे सफल हूँ क्यों एक सरकारी बैंक में वरिष्ठ प्रबन्धक हूँ !लेकिन खुद की नज़र में बैंक की नौकरी करना मेरी असफलता है !मैं लेक्चरर होना चाहता था , पत्रकार होना चाहता था, पुस्तकालय की नौकरी चाहता था आदि आदि , लेकिन बैंक की नौकरी के बारे में कभी सोचा भी नहीं था ! लेकिन अंत मे मरता क्या न करता के अंदाज में बैंक की नौकरी कर रहा हूँ !
मेरे लिए किसी को यह समझाना मुश्किल होता है आखिर बैंक की नौकरी में खराबी क्या है ! सच मे ऐसी कोई खराब नौकरी नहीं है ! सच पूछिए तो समाज के संदर्भ में बैंकर की उपयोगिता साहित्यकार से ज्यादा है !रोजी रोटी तो इसी से चल रही है !इसी वजह से बर्दाश्त करता हूँ ! पसंद तो नहीं करता और गर्व की वजह तो नहीं ही मानता !
दूसरा उदाहरण दूँ !फेसबुक पोस्ट के कारण कई लोग तारीफ करते हैं (कई लोग गालियां भी देते हैं उनकी बात फिर कभी !) और मेरी एक पहचान बनी है !लेकिन हकीकत है कि मैं पोस्ट इसलिए लिखता हूँ क्योंकि और कुछ नहीं लिख सकता ! मैं कहानियाँ लिखना पसंद करता हूँ लेकिन कभी पूरी नहीं कर पाता  !ललित निबंध और लेख लिखना पसंद करता हूँ लेकिन उतना समय , श्रम और धैर्य नहीं दिखा पाता हूँ जितना इसके लिए जरूरी है !कुछ नहीं से कुछ बेहतर मानकर फेसबुक पर पोस्ट डालता हूँ ! जिन पोस्टों को मेरी सफलता माना जाता है वे मेरी नाकामी की उपज है !
खैर !खुद को सांत्वना देने के लिए मान लेना चाहिए कि शायद मैं जो हूँ उससे इतर कुछ होने की संभावना और क्षमता मुझमें नहीं थी !बहाने चाहे कितने भी हो , हैं तो बस आखिरकार -बहाने !